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जहां कभी गूंजती थी बंदूक की आवाज, अब गूंज रही किताबों की खनक, टुंडी के 100 से ज्यादा बच्चों को मिला शिक्षा का सहारा...
10/4/2026 12:45:17 PM IST
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कोयलांचल लाइव डेस्क, Koylachal Live News Team
Dhanbad
: जहां कभी बंदूक की आवाज़ और नक्सलियों का खौफ गूंजता था, वहीं अब मासूम बच्चों के हाथों में किताबें और कलमें थमा दी गई हैं। झारखंड के धनबाद जिले के टुंडी ब्लॉक स्थित मानियाडीह और तोपचाची के सुदूर नक्सल-प्रभावित गांवों के 100 से अधिक गरीब बच्चों को कुछ समर्पित सामाजिक कार्यकर्ताओं ने गोद लिया है। आज ये बच्चे हिंसा के साये से निकलकर धनबाद शहर में शिक्षा की राह पर अग्रसर हैं।
यह सराहनीय पहल धनबाद निवासी कृष्णा नंदन सिन्हा और उनके चार सहयोगियों की बदौलत संभव हुई है। इनमें से तीन महिलाओं ने घर की चौखट से बाहर निकलकर अपना पूरा समय इन बच्चों के साथ बिताया है और शिक्षा का ज्योत जलाया है। धनबाद के जगजीवन नगर स्थित बीसीएल (Bharat Coking Coal Limited) के खाली पड़े क्वार्टर में चल रहा यह निःशुल्क आवासीय स्कूल इन बच्चों को न केवल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान कर रहा है, बल्कि उन्हें एक सुरक्षित और उज्ज्वल भविष्य की ओर भी अग्रसर कर रहा है।
*जगजीवन नगर की खामोश कोठरियों में गूंजी कलम*
यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस सपने को साकार कर रही है, जहां हर भारतीय बच्चे के हाथ में बंदूक नहीं, बल्कि किताब हो। मोदी जी ने हमेशा कहा है कि देश का असली विकास तब होगा जब नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के बच्चे आतंक के बजाय शिक्षा चुनेंगे। टुंडी के ये बच्चे उसी विचारधारा पर चल रहे हैं। केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, नक्सल-प्रभावित जिलों की संख्या 2014 में 126 से घटकर 2025 में मात्र 11 रह गई है। इसी दिशा में झारखंड में 259 एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (EMRS) स्वीकृत किए गए हैं, जिनमें से 179 पहले ही संचालित हो चुके हैं। धनबाद के जगजीवन नगर का यह स्कूल उसी राष्ट्रीय मिशन के समानांतर एक छोटी लेकिन महत्वपूर्ण कड़ी है।
*40 किलोमीटर दूर से शिक्षा की तलाश*
टुंडी ब्लॉक का मानियाडीह गांव धनबाद शहर से लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित है। यह इलाका लंबे समय से नक्सल प्रभावित रहा है, जहां बैंक और स्वास्थ्य केंद्र जैसी बुनियादी सुविधाएं भी शून्य के सामान हैं। ऐसे में इन बच्चों के लिए धनबाद के जगजीवन नगर में यह स्कूल एक वरदान साबित हुआ है।
*जमीन बेचकर चल रही पाठशाला*
इस मिशन को सफल बनाने के लिए संस्थापक कृष्णा नंदन सिन्हा और उनके चार सहयोगियों ने अपनी पूर्वजों की जमीन तक बेच दी। कृष्णा नंदन के प्राइवेट स्कूल में दो वैन भी चलती हैं, जिनसे आने वाली कमाई और चारों सहयोगी अपनी पूरी लगन से इस कार्य में जुटे हुए हैं। कुछ महिला शिक्षक सुबह से लेकर शाम तक इस स्कूल में अपना योगदान देती हैं, जबकि उनके अपने घर वालों की गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा इन बच्चों की पढ़ाई और रहने-खाने पर खर्च कर देते हैं। यह कुर्बानी मोदी जी के 'सेवा ही संगठन' और 'सबका साथ, सबका विकास' के मंत्र से प्रेरित है। स्कूल के शिक्षकों का कहना है कि वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ाना बच्चों को कट्टरपंथी संगठनों से दूर रखने का सबसे कारगर उपाय है।
*पोषण से लेकर ड्रेस तक: सब कुछ मुफ्त*
इस स्कूल में बच्चों के भोजन का विशेष ध्यान रखा जाता है ताकि वे कुपोषण से बच सकें, सुबह का नाश्ता: पूरी, सब्जी, खीर और फल ,दोपहर का भोजन: चावल, दाल, सब्जी, पापड़,शाम का नाश्ता: उबला चना, हरा मूंग, गुड़
रात का भोजन में रोटी, सब्जी, हलवा, इसके अलावा कॉपी-किताब, ड्रेस, आवास सब कुछ मुफ्त है। बच्चों को कॉपी-किताब से लेकर ड्रेस तक का सारा खर्च स्कूल प्रबंधक ही उठाते हैं। यह सभी खर्च स्कूल संस्थापक और कुछ सहयोगियों द्वारा किया जाता है, जबकि बिल्डिंग कोल इंडिया लिमिटेड की सहायक कंपनी बीसीएल द्वारा मुहैया कराई गई है।
*सुरक्षा की चुनौती: असामाजिक तत्वों की साजिश*
लेकिन राह आसान नहीं है। संस्था संचालक का आरोप है कि कुछ असामाजिक तत्व स्कूल को बंद कराने की साजिश रच रहे हैं। परिसर में तोड़फोड़ और माहौल बिगाड़ने की घटनाएं सामने आई हैं। प्रबंधन ने जिला प्रशासन और पुलिस से सुरक्षा की गुहार लगाई है।
मोदी जी ने हमेशा कहा है कि शिक्षा वह हथियार है जो गरीबी, अंधविश्वास और हिंसा को हरा सकता है। टुंडी के ये बच्चे उसी बात को साबित कर रहे हैं। जिनके पिता होटल में झूठन साफ करते थे, आज वे अपने बच्चों को कलम पकड़ाकर मोदी के सपनों का भारत बना रहे हैं।
*समाज और प्रशासन से गुहार*
अब जरूरत है कि समाज और प्रशासन इस पहल को सुरक्षा और सहयोग दे। क्योंकि आज जिन हाथों में किताबें हैं, वे कल अपने गांव की तस्वीर बदल सकती हैं—बशर्ते हम सब मिलकर इनकी हिफाजत करें।
संजना सिंह कोयलांचल लाइव डेस्क
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