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AI और क्लाउड बूम को संभालने की तैयारी, कंपनियां लगा रहीं अरबों डॉलर का दांव

11/27/2025 3:27:08 PM IST

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कोयलांचल लाइव डेस्क, Koylachal Live News Team
देश के सबसे बड़े उद्योग घराने, टाटा, रिलायंस, अडानी और एयरटेल..अब एक ही मैदान में आमने-सामने हैं. यह मैदान है डेटा सेंटर्स का. अगले एक दशक में भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और क्लाउड कंप्यूटिंग की जो बाढ़ आने वाली है, उसे संभालने के लिए ये दिग्गज कंपनियां अरबों डॉलर पानी की तरह बहा रही हैं. आखिर ये कंपनियां ऐसा क्यों कर रही हैं और इसका एक आम भारतीय इंटरनेट यूजर पर क्या असर पड़ेगा? आइए, विस्तार से समझते हैं। 
 
‘हाइपरवोल्ट’ का महाजाल
इस रेस में सबसे ताजा नाम जुड़ा है टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) का. अब तक टीसीएस अपनी ‘एसेट-लाइट’ यानी कम संपत्ति वाली रणनीति के लिए जानी जाती थी, लेकिन अब खेल बदल चुका है. टीसीएस ने अपनी पुरानी रणनीति से हटकर एक बड़ा फैसला लिया है. कंपनी ने प्राइवेट इक्विटी फर्म TPG के साथ मिलकर 18,000 करोड़ रुपये (लगभग 2.1 अरब डॉलर) के निवेश की योजना बनाई है। 
 
इस साझेदारी के तहत ‘हाइपरवोल्ट एआई डेटा सेंटर लिमिटेड’ (HyperVault AI Data Centre Ltd) का निर्माण किया जाएगा. इसकी क्षमता 1.2 गीगावाट (GW) होगी. इस आंकड़े की अहमियत का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि यह क्षमता आज भारत में मौजूद सभी डेटा सेंटर्स की कुल क्षमता के बराबर है. टीसीएस के सीईओ के. कीर्तिवासन के मुताबिक, वे एक पैसिव (बुनियादी) ढांचा तैयार कर रहे हैं, जिसमें ग्राहक अपनी जरूरत के हिसाब से हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर फिट कर सकेंगे.
 
अंबानी और अडानी का ‘गीगावाट’ वाला गेमप्लान
टाटा की इस चुनौती का जवाब देने के लिए रिलायंस और अडानी समूह पहले से ही कमर कस चुके हैं. गौतम अडानी की अगुवाई वाला अडानी ग्रुप डेटा सेंटर के मामले में बेहद आक्रामक है. अक्टूबर में ही अडानी ग्रुप ने विशाखापत्तनम में 15 अरब डॉलर के एआई डेटा सेंटर के लिए गूगल के साथ साझेदारी की घोषणा की है. इसके अलावा, महाराष्ट्र में 5.9 अरब डॉलर का निवेश और ‘अडानीकॉनेक्स’ (AdaniConneX) के जरिए मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद और पुणे में उनका जाल पहले से ही फैल रहा है.
 
वहीं रिलायंस इंडस्ट्रीज के मुकेश अंबानी भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं. जामनगर में 1 गीगावाट के डेटा सेंटर की घोषणा के बाद, रिलायंस ने अब विशाखापत्तनम में एक और 1 गीगावाट एआई डेटा सेंटर बनाने के लिए 11 अरब डॉलर का निवेश करने का फैसला किया है. इसके लिए उन्होंने ब्रुकफील्ड और डिजिटल रियल्टी जैसी दिग्गज ग्लोबल कंपनियों के साथ हाथ मिलाया है.
 
सितंबर में आई जेफ़रीज़ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारती एयरटेल, रिलायंस इंडस्ट्रीज़ और अडानीकॉननेक्स मिलकर 2030 तक भारत की 3540% डेटा सेंटर क्षमता का जिम्मा संभालेंगे. एयरटेल की Nxtra Data अभी ही करीब 15% मार्केट शेयर रखती है, जिसे कंपनी के मज़बूत फ्री कैश फ्लो और एंटरप्राइज ग्राहकों का फायदा मिलता है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत में डेटा सेंटर की खपत में हाइपरस्केलर्स का हिस्सा 60% है, जबकि BFSI सेक्टर करीब 17% योगदान देता है.
 
सब डेटा सेंटर्स के पीछे क्यों भाग रहे हैं?
अब सवाल उठता है कि अचानक सब डेटा सेंटर्स के पीछे क्यों भाग रहे हैं? इसका सीधा जवाब है, आपकी और हमारी डेटा खपत. जेएलएल (JLL) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2017 में भारत में डेटा की खपत महज 8 एक्साबाइट थी, जो वित्त वर्ष 2025 तक बढ़कर 229 एक्साबाइट हो गई है (याद रहे, 1 एक्साबाइट = 1 अरब गीगाबाइट्स). हम दुनिया में सबसे ज्यादा वायरलेस इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले लोगों में से हैं. ओटीटी प्लेटफॉर्म्स, यूपीआई पेमेंट्स, ई-कॉमर्स और अब एआई (ChatGPT जैसे टूल्स) के आने से डेटा की भूख बेतहाशा बढ़ी है.
 
कोटक म्यूचुअल फंड्स के अनुसार, भारत दुनिया का लगभग 20% डेटा जेनरेट करता है, लेकिन हम इसमें से केवल 3% डेटा ही अपने देश में स्टोर कर पाते हैं. यही वह गैप है जिसे भरने के लिए अगले 5 से 7 सालों में 50 अरब डॉलर (करीब 4 लाख करोड़ रुपये) से ज्यादा का निवेश होने वाला है. जेफरीज (Jefferies) का अनुमान है कि 2030 तक भारत की डेटा सेंटर क्षमता आज के 1 GW से बढ़कर 8 GW तक पहुंच जाएगी.
 
भारत ही क्यों बन रहा है दुनिया की पसंद?
सिर्फ घरेलू मांग ही नहीं, बल्कि ग्लोबल फैक्टर भी भारत के पक्ष में हैं. यहां डेटा सेंटर बनाने की लागत दुनिया के मुकाबले काफी कम है. भारत में डेटा सेंटर बनाने का खर्च लगभग 7 डॉलर प्रति वाट आता है, जो वैश्विक स्तर की तुलना में कम है. साथ ही, यहां बिजली की कीमतें अमेरिका के मुकाबले करीब 20% सस्ती हैं. सरकार भी इस सेक्टर को पूरा सपोर्ट दे रही है. तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसी राज्य सरकारें बिजली शुल्क में छूट और स्टाम्प ड्यूटी में 100% तक की माफी दे रही हैं. इसके अलावा, भारत के पास एक मजबूत सबमरीन केबल नेटवर्क है, जो मुंबई और चेन्नई जैसे शहरों को ‘डेटा के इंटरनेशनल एयरपोर्ट’ में बदल रहा है। 
 
कोयलांचल लाइव डेस्क