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फ्रीबीज के जाल में लोकतंत्र, अर्थव्यवस्था और मतदाता की बदलती मानसिकता, क्या चुनाव अब विकास पर नहीं, मुफ्त वादों पर जीते जा रहे हैं?

6/12/2026 1:58:24 PM IST

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कोयलांचल लाइव डेस्क, Koylachal Live News Team
पटना :  भारतीय लोकतंत्र आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां चुनावी बहस सड़क, अस्पताल, शिक्षा, उद्योग और रोजगार से हटकर मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, नकद सहायता, मुफ्त बस यात्रा, मुफ्त गैस सिलेंडर, लैपटॉप, स्कूटी और महिलाओं को मासिक भत्ते जैसे वादों के इर्द-गिर्द घूमने लगी है।इस बात को बारीकी से वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया ने कहा ,उन्होंने कहा की आज की राजनीतिक  "फ्रीबीज" या आम बोलचाल की भाषा में "रेवड़ी संस्कृति"  की तरह हो गई है। दिलचस्प बात यह है कि कभी जो दल इसे आर्थिक अपराध और वोट खरीदने की राजनीति बताते थे, आज वही दल इसे चुनावी रणनीति का सबसे प्रभावी हथियार बना चुके हैं। विपक्ष हो या सत्ता पक्ष, लगभग सभी बड़े राजनीतिक दल किसी न किसी रूप में फ्रीबीज की राजनीति कर रहे हैं।
 
फ्रीबीज क्या है?
फ्रीबीज का अर्थ है सरकार या राजनीतिक दल द्वारा जनता को बिना प्रत्यक्ष मूल्य लिए वस्तु, सेवा या नकद सहायता देना, जिसका उद्देश्य सामाजिक सुरक्षा भी हो सकता है और चुनावी लाभ भी।
उदाहरण:मुफ्त बिजली,मुफ्त पानी,महिलाओं को नकद सहायता,मुफ्त बस यात्रा,किसानों की ऋण माफी,मुफ्त लैपटॉप और स्मार्टफोन,मुफ्त राशन,मुफ्त गैस सिलेंडर
हालांकि हर मुफ्त योजना फ्रीबीज नहीं होती। शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण जैसी संवैधानिक जिम्मेदारियों के तहत दी जाने वाली सुविधाओं को कई अर्थशास्त्री जनकल्याणकारी निवेश मानते हैं, जबकि बिना वित्तीय आधार के चुनावी वादों को "फ्रीबीज" कहते हैं।
 
क्या फ्रीबीज की शुरुआत किसी एक पार्टी ने की?
इसका सीधा उत्तर नहीं है।
भारत में सब्सिडी और मुफ्त योजनाएं कई दशकों से मौजूद हैं। दक्षिण भारत में 1960 और 1970 के दशक से सस्ती खाद्यान्न योजनाएं शुरू हुईं।1980 के दशक में आंध्र प्रदेश में ₹2 किलो चावल योजना लोकप्रिय हुई। बाद में तमिलनाडु में टीवी, मिक्सर, ग्राइंडर, लैपटॉप जैसी योजनाओं ने चुनावी राजनीति का नया मॉडल बनाया।इसके बाद अलग-अलग राज्यों में लगभग सभी दलों ने इस मॉडल को अपनाया।इसलिए किसी एक पार्टी को इसका जनक कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
 
बीजेपी ने फ्रीबीज की आलोचना क्यों की और फिर खुद क्यों अपनाया?
कुछ वर्षों तक भारतीय जनता पार्टी ने "रेवड़ी संस्कृति" की आलोचना करते हुए कहा कि इससे अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ता है और उत्पादक निवेश कम होता है। लेकिन समय के साथ चुनावी राजनीति बदल गई। जब विभिन्न राज्यों में मुफ्त योजनाओं को जनता का व्यापक समर्थन मिला, तब बीजेपी ने भी कई राज्यों में स्थानीय जरूरतों के अनुसार इसी तरह की योजनाएं शुरू कीं।
उदाहरण के तौर पर विभिन्न राज्यों में— महिलाओं को आर्थिक सहायता,किसानों के लिए नकद सहायता,मुफ्त राशन,छात्रवृत्ति,गैस सिलेंडर पर सब्सिडी,बिजली बिल राहत जैसी योजनाओं को चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा बनाया गया। यानी जिस मॉडल की कभी आलोचना हुई, वही आज लगभग सभी दलों की रणनीति बन चुका है।
 
क्या बीजेपी ने केवल फ्रीबीज के सहारे चुनाव जीते?
ऐसा कहना भी सही नहीं होगा।
बीजेपी की चुनावी सफलताओं के पीछे कई कारण रहे हैं—
मजबूत संगठन , नेतृत्व की लोकप्रियता, राष्ट्रवाद का मुद्दा, कल्याणकारी योजनाओं की डिलीवरी, बूथ प्रबंधन, डिजिटल प्रचार, विपक्ष की कमजोरी
फ्रीबीज इनमें एक तत्व हो सकता है, लेकिन अकेला कारण नहीं। इसी प्रकार अन्य दलों की जीत भी केवल मुफ्त योजनाओं से नहीं हुई।
 
जनता मुफ्त योजनाओं की ओर क्यों आकर्षित होती है?
भारत की बड़ी आबादी अभी भी सीमित आय पर निर्भर है।
जब सरकार कहती है— बिजली मुफ्त मिलेगी, महिलाओं को हर महीने नकद सहायता मिलेगी, राशन मुफ्त मिलेगा, तो इसका सीधा असर परिवार के मासिक बजट पर पड़ता है।
इसलिए गरीब और निम्न मध्यम वर्ग इन योजनाओं को राहत के रूप में देखते हैं।
यहीं से राजनीति और कल्याणकारी योजनाओं की सीमा धुंधली होने लगती है।
 
फ्रीबीज और विकास में क्या अंतर है? 
 
विकास:रोजगार पैदा करता है, उद्योग और निवेश बढ़ाता है, दीर्घकालीन लाभ, कर राजस्व बढ़ता है, आत्मनिर्भरता बढ़ती है।
फ्रीबीज: तत्काल राहत देता है, उपभोग बढ़ाता है, अल्पकालिक लाभ, सरकारी खर्च बढ़ता है, निर्भरता बढ़ सकती है।
 
क्या फ्रीबीज से देश पर कर्ज बढ़ता है?
यदि मुफ्त योजनाएं बिना पर्याप्त राजस्व और वित्तीय योजना के चलाई जाएं, तो सरकार को अतिरिक्त उधार लेना पड़ सकता है। भारत में केंद्र और राज्य सरकारें हर वर्ष बजट घाटे की पूर्ति के लिए बाजार से कर्ज लेती हैं। लेकिन यह कहना कि पूरा कर्ज केवल फ्रीबीज की वजह से है, सही नहीं होगा।
कर्ज के अन्य कारण भी हैं— बुनियादी ढांचा निर्माण, रक्षा खर्च, स्वास्थ्य, शिक्षा, प्राकृतिक आपदाएं, ब्याज भुगतान
फिर भी अर्थशास्त्री लगातार चेतावनी देते रहे हैं कि अत्यधिक चुनावी मुफ्त योजनाएं राज्यों की वित्तीय स्थिति कमजोर कर सकती हैं।
 
क्या जनता फ्रीबीज की आदी हो रही है?
यह सबसे बड़ा प्रश्न है।
जब हर चुनाव में नए मुफ्त वादे किए जाते हैं तो मतदाता भी यह अपेक्षा करने लगता है कि अगली सरकार उससे अधिक लाभ देगी।
इसका परिणाम यह हो सकता है कि— रोजगार का मुद्दा पीछे छूट जाए, उद्योग और निवेश पर चर्चा कम हो, शिक्षा और स्वास्थ्य सुधार पर दबाव घट जाए, राजनीति प्रतिस्पर्धी विकास की बजाय प्रतिस्पर्धी मुफ्त वितरण में बदल जाए।
 
नेताओं का पैसा विकास पर ज्यादा खर्च हो रहा है या रेवड़ी पर?
 
सरकारी बजट का अधिकांश हिस्सा अभी भी— सड़क, रेलवे, रक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, सिंचाई, सामाजिक सुरक्षा, ग्रामीण विकास पर खर्च होता है। लेकिन चुनावी वर्षों में कल्याणकारी योजनाओं और नकद सहायता कार्यक्रमों का हिस्सा बढ़ जाता है। यही कारण है कि कई विशेषज्ञ मांग करते हैं कि हर चुनावी घोषणा के साथ उसका वित्तीय स्रोत भी सार्वजनिक किया जाए।
 
क्या यह लोकतंत्र के लिए खतरा है?
यदि चुनाव केवल मुफ्त घोषणाओं की प्रतिस्पर्धा बन जाएं, तो लोकतंत्र का मूल उद्देश्य प्रभावित हो सकता है। मतदाता को यह प्रश्न भी पूछना चाहिए— रोजगार कितना मिला? शिक्षा की गुणवत्ता कैसी है? अस्पताल कितने बने? उद्योग कितने आए? युवाओं के लिए अवसर कितने बढ़े? यदि ये प्रश्न गायब हो जाएं और केवल मुफ्त लाभ केंद्र में रह जाएं, तो लोकतंत्र की गुणवत्ता कमजोर हो सकती है।
 
पक्ष और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी
सत्ता पक्ष वित्तीय अनुशासन बनाए रखे। केवल चुनाव जीतने के लिए अव्यवहारिक वादे न करे। कल्याणकारी योजनाओं को उत्पादक निवेश से जोड़े।
विपक्ष केवल मुफ्त घोषणाओं की प्रतिस्पर्धा न करे। रोजगार, शिक्षा और आर्थिक सुधार का वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत करे। वित्तीय जवाबदेही पर जनता को जानकारी दे।
समाज को क्या करना चाहिए?
एक जागरूक मतदाता को केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि उसे क्या मुफ्त मिलेगा। बल्कि यह भी पूछना चाहिए— पैसा कहां से आएगा? इसका भविष्य पर क्या असर होगा? क्या इससे मेरे बच्चों को रोजगार मिलेगा? क्या इससे राज्य आर्थिक रूप से मजबूत होगा?
 
निष्कर्ष : फ्रीबीज अपने आप में पूरी तरह गलत भी नहीं हैं और पूरी तरह सही भी नहीं। यदि वे गरीबों के लिए सामाजिक सुरक्षा का माध्यम बनें, तो उनका महत्व है। लेकिन यदि वे केवल चुनाव जीतने की रणनीति बन जाएं और विकास, रोजगार तथा उत्पादक निवेश को पीछे छोड़ दें, तो यह लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए चिंता का विषय है।
 
आज आवश्यकता इस बात की है कि जनता "मुफ्त क्या मिलेगा?" से आगे बढ़कर "देश और राज्य कैसे आगे बढ़ेंगे?" यह प्रश्न पूछे।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जागरूक मतदाता है। यदि वोट विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सुशासन के आधार पर पड़ेंगे, तो राजनीतिक दल भी अपनी प्राथमिकताएं बदलने के लिए बाध्य होंगे।रेवड़ी से राहत मिल सकती है, लेकिन स्थायी समृद्धि केवल विकास, निवेश, शिक्षा और रोजगार से ही आती है। यही भारत की आर्थिक मजबूती और लोकतांत्रिक परिपक्वता का वास्तविक मार्ग है।
 
ब्यूरो रिपोर्ट कोयलांचल लाइव