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राज्यसभा चुनाव: कांग्रेस ओबीसी, दलित, आदिवासी रटती-रटती ब्राह्मण पर आई, भाजपा : झारखंड में स्वच्छ राजनीति, तो क्या मध्यप्रदेश में अस्वच्छ राजनीति!

6/8/2026 2:32:35 PM IST

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कोयलांचल लाइव डेस्क, Koylachal Live News Team
Edited by Anu Sharma 
Dhanbad : दस राज्यों में होनेवाले राज्यसभा चुनाव में दिलचस्प नजारा है। झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों पर चुनाव होना है। इस राज्य में 81 विधायक हैं। इस लिहाज से 28 विधायकों का वोट किसी भी प्रत्याशी को जीत दिला सकता है। सत्ताधारी इंडिया ब्लॉक के 56 विधायक हैं। ये अगर इधर-उधर न हों, तो दोनों सीटों पर गठबंधन के प्रत्याशी जीत जाएंगे। सत्ताधारी मुख्य दल झामुमो के 34 विधायक हैं। इसलिए उसके एक प्रत्याशी की जीत में कोई किंतु-परंतु नहीं है। झामुमो ने दलित कार्ड खेलते हुए पूर्व mla बैजनाथ राम को उतारा है। सत्ता में सहयोगी कांग्रेस के 16 विधायक हैं। यानी जीत के लिए वह पराश्रित है। वह सड़क से संसद तक ओबीसी, दलित, आदिवासी रटती रहती है। लेकिन राज्यसभा चुनाव में झारखंड से थोड़ा-बहुत संबंध रखनेवाले ब्राह्मण प्रणव झा को उसने अपना प्रत्याशी बनाया है। झा महोदय कांग्रेस प्रमुख मल्लिकार्जुन खरगे के करीबी हैं और एक तरह से दिल्ली की राजनीति करते हैं। राजद-4 और माले-2 के अलावा झामुमो के अतिरिक्त सभी 6 विधायकों का सक्रिय सहयोग समर्थन मिल जाए (यदि), तो इनका भी बेड़ा पार लग सकता है। बीजेपी के 21 विधायक हैं। उसके नेतृत्व वाले nda में जेडीयू के पास एक, आजसू के पास एक और लोजपा के पास एक mla हैं। यानी nda के पास विधायकों की कुल जमा पूंजी 24 है, जीत के लिए चाहिए 28 एमएलए। पहले बात उड़ी कि बीजेपी गौरव वल्लभ को प्रत्याशी बनाएगी। ये सज्जन हैं तो मूलतः राजस्थान निवासी, लेकिन विधानसभा चुनाव में झारखंड के जाने-माने बीजेपी नेता और मुख्यमंत्री रह चुके रघुवर दास को कांग्रेस के टिकट पर चुनौती देते रहे थे। फिर कई अन्य लोगों की तरह इनका भी दिल बदला, तो दल बदलकर बीजेपी में चले गए। खैर, बीजेपी ने अंततः उनको झारखंड से राज्यसभा चुनाव में प्रत्याशी नहीं बनाया। इस बीच एक परिमल नाथवानी महोदय की इंट्री हो गई। वे मूलतः गुजरात के रहवासी हैं और उद्योगपति बताए जाते हैं। पूर्व में दो बार वे निर्दलीय प्रत्याशी के बतौर झारखंड से राज्यसभा का चुनाव जीत चुके थे। बाद में आंध्रप्रदेश का कल्याण करने चले गए। आज की तारीख में वे आंध्रप्रदेश से राज्यसभा सदस्य यानी सांसद हैं। वे कहीं से भी निर्दलीय जीत जाने में माहिर हैं। कारण! कारण बताने की जरूरत नहीं शायद। इतना तो हर कोई समझता ही है।  तो इस बार भी नाथवानी महोदय ने झारखंड से राज्यसभा चुनाव में अपनी उम्मीदवारी का पर्चा बतौर निर्दलीय प्रत्याशी दाखिल कर दिया। इस कहानी का ट्विस्ट यह है कि बीजेपी ने नाथवानी जी को समर्थन दिया है। वे पहले भी इस राज्य से राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं, गुजरात के निवासी हैं और उद्योगपति भी हैं, बीजेपी ने उनको समर्थन देकर गलत तो किया नहीं। लेकिन असल ट्विस्ट इस विषय पर बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू के जवाब पर है, जो उन्होंने एक पत्रकार के सवाल पर कहा। उन्होंने कहा, बीजेपी स्वच्छ राजनीति करती है। चूंकि हमारे पास संख्या बल नहीं है, इसलिए हमने अपना प्रत्याशी नहीं उतारा। नाथवानी जी ने समर्थन मांगा, तो दे दिया। बाकी वो समझें।  ट्विस्ट यह कि मध्यप्रदेश में तीन सीटों पर हो रहे राज्यसभा चुनाव में बीजेपी ने तीन प्रत्याशी दिए हैं, जबकि उसके पास दो ही प्रत्याशी जिताने लायक संख्या बल है। ... तो तीसरा प्रत्याशी किस उम्मीद में खड़ा किया गया। जो बीजेपी झारखंड में संख्याबल न होने के कारण प्रत्याशी न देकर राजनीतिक स्वच्छता की दुहाई दे रही है, वही बीजेपी मध्यप्रदेश में जरूरी संख्याबल न होने पर भी प्रत्याशी उतारकर क्या अस्वच्छ राजनीति में कूद रही है! कह सकते हैं, जाने भी दो यारो! हमें क्या! राजनीतिक दल है, तो राजनीति ही करेगा। झारखंड के लिए जो अस्वच्छ है, मध्यप्रदेश के लिए वही स्वच्छ है। हमें कौन सा वोट देना है, जो हम मगजमारी करें! 
 
संजना सिंह कोयलांचल लाइव डेस्क