Date: 01/08/2026 Saturday
ABOUT US
ADVERTISE WITH US
Contact Us
Koylanchal Live
बड़ी खबरें
देश प्रदेश
राज्य
MUMBAI
महाराष्ट्र
राजस्थान
गुजरात
उत्तराखंड
पश्चिम बंगाल
तमिलनाडु
ओडिशा
पंजाब
झारखण्ड
उत्तर प्रदेश
जम्मू कश्मीर
दिल्ली
आंध्र प्रदेश
बिहार
छत्तीसगढ़
MADHYA PRADESH
HIMACHAL PARADESH
राजधानी
रांची
पटना
लखनऊ
राजनीति
अपराध जगत
स्पोर्ट्स
वर्ल्ड न्यूज़
बिज़नेस
इंटरटेनमेंट
कोयलांचल लाइव TV
फोटो गैलरी
पीएम-किसान, ‘समुद्र मंथन’, सूर्य सरोवर और खेलो इंडिया के जरिए सरकार ने एक साथ खेती, ऊर्जा और युवा शक्ति पर लगाया बड़ा दांव
8/1/2026 3:26:46 PM IST
6
कोयलांचल लाइव डेस्क, Koylachal Live News Team
वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया
Delhi :
किसी भी देश की दिशा का अंदाजा उसके बजट से कम और उसकी प्राथमिकताओं से अधिक लगाया जाता है। सरकार पैसा कहां खर्च कर रही है, किन क्षेत्रों को भविष्य का आधार मान रही है और किन वर्गों को सुरक्षा देने की कोशिश कर रही है, यही किसी राष्ट्र की विकास यात्रा का असली संकेत होता है।
केंद्रीय मंत्रिमंडल की हालिया बैठक में लिए गए फैसलों को भी इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) योजना को अगले पांच वर्षों तक जारी रखने का निर्णय, गहरे समुद्र में तेल और गैस की खोज के लिए 84,084 करोड़ रुपये की ‘समुद्र मंथन’ योजना, जलाशयों पर फ्लोटिंग सोलर परियोजनाओं के लिए ‘सूर्य सरोवर’ कार्यक्रम और खेलो इंडिया योजना का विस्तार—ये चारों फैसले अलग-अलग दिख सकते हैं, लेकिन इनके केंद्र में एक ही सोच दिखाई देती है।
यह सोच है—ग्रामीण भारत को सहारा, ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और युवाओं को अवसर।
लेकिन इन घोषणाओं के साथ कई सवाल भी खड़े होते हैं। क्या यह भविष्य की तैयारी है या वर्तमान की राजनीतिक जरूरत? क्या इन योजनाओं से वास्तव में लोगों की जिंदगी बदलेगी या यह केवल सरकारी दस्तावेजों तक सीमित रह जाएंगी? और सबसे बड़ा सवाल—क्या लाखों करोड़ रुपये का यह निवेश आने वाले भारत की मजबूत नींव साबित होगा?
•
किसान को राहत मिली, लेकिन क्या समृद्धि भी मिलेगी?
भारत आज भी गांवों का देश है। भले ही शहरों की चमक बढ़ी हो, लेकिन देश की बड़ी आबादी आज भी खेती पर निर्भर है। किसान केवल अन्नदाता नहीं है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था का आधार भी है। यही वजह है कि जब सरकार ने पीएम-किसान योजना को अगले पांच वर्षों तक जारी रखने का फैसला किया तो इसे करोड़ों किसानों के लिए राहत की खबर माना गया।
इस योजना के तहत पात्र किसानों को सालाना 6,000 रुपये की आर्थिक सहायता सीधे उनके बैंक खाते में भेजी जाती है। सरकार का दावा है कि इससे किसानों को आर्थिक सुरक्षा मिलती है और उनकी छोटी-मोटी जरूरतें पूरी होती हैं। लेकिन यहां पहला बड़ा सवाल पैदा होता है।
•
क्या 6,000 रुपये आज भी पर्याप्त हैं?
जब खाद, बीज, डीजल, बिजली और मजदूरी की लागत लगातार बढ़ रही हो, तब सालाना छह हजार रुपये कितनी राहत दे सकते हैं? सच्चाई यह है कि यह राशि किसी किसान को आर्थिक रूप से मजबूत नहीं बना सकती, लेकिन संकट की घड़ी में एक सहारा जरूर देती है।
कई कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि पीएम-किसान योजना किसानों के लिए एक "सुरक्षा कवच" है, लेकिन यह आय बढ़ाने का स्थायी समाधान नहीं है। किसानों की वास्तविक आय तभी बढ़ेगी जब उन्हें बेहतर बाजार मिलेगा, फसल का उचित मूल्य मिलेगा, सिंचाई सुविधाएं मजबूत होंगी और कृषि आधारित उद्योगों का विस्तार होगा। यानी पीएम-किसान जरूरी है, लेकिन अकेले पर्याप्त नहीं।
•
3.15 लाख करोड़ का सवाल: खर्च या निवेश?
सरकार ने योजना के विस्तार के लिए 3.15 लाख करोड़ रुपये के प्रावधान को मंजूरी दी है। यह राशि छोटी नहीं है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि क्या इतना बड़ा खर्च उचित है? इसका जवाब गांवों की अर्थव्यवस्था में छिपा है।
जब किसानों के हाथ में पैसा आता है तो वह केवल बैंक खाते में नहीं रहता। उससे बाजार चलता है, दुकानों पर खरीदारी होती है, छोटे व्यापारियों को लाभ होता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी का प्रवाह बढ़ता है।
यानी यह केवल किसानों पर खर्च नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में निवेश भी है। लेकिन इसके साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि अपात्र लोगों को लाभ न मिले और हर पात्र किसान तक योजना पहुंचे।
•
समुद्र की गहराइयों में भारत का भविष्य तलाशने की कोशिश
कैबिनेट के फैसलों में सबसे अधिक चर्चा ‘समुद्र मंथन’ योजना की हो रही है। नाम भी आकर्षक है और उद्देश्य भी महत्वाकांक्षी। सरकार ने गहरे और अति-गहरे समुद्री क्षेत्रों में तेल और गैस की खोज के लिए 84,084 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी है।
यह फैसला केवल ऊर्जा क्षेत्र का मामला नहीं है। यह भारत की रणनीतिक और आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा विषय है। आज भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ती है, उसका असर सीधे भारतीय परिवारों की जेब पर पड़ता है।
•
पेट्रोल महंगा होता है।
•
डीजल महंगा होता है।
•
रसोई गैस महंगी होती है।
•
महंगाई बढ़ती है।
यानी ऊर्जा आयात केवल आर्थिक मुद्दा नहीं है, यह आम आदमी की जिंदगी से जुड़ा विषय है।
•
क्या इससे पेट्रोल और गैस सस्ती हो जाएगी?
यह सबसे बड़ा सवाल है जो आम लोग पूछ रहे हैं।
इसका सीधा जवाब है—तुरंत नहीं।
तेल और गैस की खोज में वर्षों लगते हैं। उसके बाद उत्पादन शुरू होता है। फिर बाजार तक पहुंचने की प्रक्रिया आती है। लेकिन यदि भारत घरेलू उत्पादन बढ़ाने में सफल होता है तो लंबे समय में आयात पर निर्भरता कम हो सकती है और कीमतों पर दबाव घट सकता है। यानी यह योजना आज के लिए नहीं, बल्कि अगले 10-20 वर्षों के भारत के लिए है।
•
क्या पर्यावरण को खतरा होगा?
जब भी समुद्री क्षेत्रों में तेल और गैस की खोज होती है तो पर्यावरण संबंधी चिंताएं सामने आती हैं। समुद्री जैव विविधता, समुद्री प्रदूषण और पारिस्थितिक संतुलन जैसे मुद्दों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यही वजह है कि सरकार के लिए यह जरूरी होगा कि ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखा जाए। विकास तभी सार्थक होगा जब वह टिकाऊ भी हो।
•
सूर्य सरोवर: पानी से बिजली बनाने का नया सपना
यदि समुद्र मंथन भारत की ऊर्जा सुरक्षा का प्रतीक है, तो सूर्य सरोवर भारत के हरित भविष्य का संकेत है। इस योजना के तहत देशभर के जलाशयों पर फ्लोटिंग सोलर परियोजनाएं विकसित की जाएंगी। सरकार का लक्ष्य 5,000 मेगावाट क्षमता विकसित करने का है। पहली नजर में यह केवल एक सोलर योजना लग सकती है, लेकिन इसके पीछे दूरगामी सोच छिपी हुई है। भारत में सौर ऊर्जा के विस्तार की सबसे बड़ी चुनौती भूमि है। बड़ी परियोजनाओं के लिए विशाल जमीन चाहिए। कई बार कृषि भूमि और पर्यावरणीय मुद्दे सामने आते हैं। फ्लोटिंग सोलर इस समस्या का समाधान प्रस्तुत करता है।
•
इससे आम लोगों को क्या फायदा होगा?
यदि यह योजना सफल होती है तो:
•
स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन बढ़ेगा।
•
कोयले पर निर्भरता कम होगी।
•
बिजली उत्पादन की लागत में कमी आ सकती है।
•
जलाशयों में पानी का वाष्पीकरण कम हो सकता है।
•
कार्बन उत्सर्जन घटाने में मदद मिलेगी।
हालांकि इसके रखरखाव और लागत संबंधी चुनौतियां भी होंगी।
लेकिन यह स्पष्ट है कि भारत अब ऊर्जा के पारंपरिक और हरित दोनों स्रोतों पर एक साथ काम कर रहा है।
•
खेलो इंडिया: क्या भारत ओलंपिक महाशक्ति बनने की तैयारी कर रहा है?
कैबिनेट ने खेलो इंडिया योजना के विस्तार को भी मंजूरी दी है। पहली नजर में यह फैसला अन्य योजनाओं की तुलना में कम महत्वपूर्ण लग सकता है, लेकिन इसके प्रभाव दूरगामी हो सकते हैं। भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। देश के गांवों और कस्बों में प्रतिभाओं की कमी नहीं है।
कमी है अवसरों की।
कई खिलाड़ी संसाधनों के अभाव में शुरुआती दौर में ही पीछे रह जाते हैं। खेलो इंडिया ने इस अंतर को कम करने का प्रयास किया है। अब इसका विस्तार यह संकेत देता है कि भारत केवल खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाला देश नहीं, बल्कि पदक जीतने वाला देश बनना चाहता है।
•
क्या यह 2036 ओलंपिक की तैयारी है?
सरकार का दावा है कि यह कार्यक्रम देश के खेल ढांचे को मजबूत करेगा। चौरसिया का मानना है कि यदि भारत भविष्य में ओलंपिक मेजबानी की दौड़ में गंभीर है, तो खेलो इंडिया जैसी योजनाएं उसकी आधारशिला बन सकती हैं।
लेकिन केवल स्टेडियम बना देने से खेल संस्कृति नहीं बनती।
उसके लिए प्रशिक्षक, पोषण, खेल विज्ञान, खेल मनोविज्ञान और दीर्घकालिक निवेश की जरूरत होती है।
•
इन चार फैसलों को एक साथ देखें तो तस्वीर क्या बनती है?
जब हम पीएम-किसान, समुद्र मंथन, सूर्य सरोवर और खेलो इंडिया को एक साथ रखते हैं, तो एक व्यापक रणनीति दिखाई देती है।
एक तरफ किसान को आर्थिक सुरक्षा देने की कोशिश है। दूसरी तरफ ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम है। तीसरी तरफ हरित ऊर्जा के जरिए भविष्य को सुरक्षित करने का प्रयास है।
और चौथी तरफ युवाओं को वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने की योजना है। यानी सरकार केवल वर्तमान नहीं, बल्कि अगले दशक के भारत की तस्वीर बनाने की कोशिश कर रही है।
•
असली परीक्षा अब शुरू होती है
भारत में योजनाओं की कमी कभी नहीं रही। चुनौती हमेशा क्रियान्वयन की रही है। योजनाएं तभी सफल होती हैं जब उनका लाभ आखिरी व्यक्ति तक पहुंचे। आज भी कई किसान ऐसे हैं जिन्हें समय पर लाभ नहीं मिल पाता। कई परियोजनाएं कागजों पर आगे बढ़ती हैं लेकिन जमीन पर धीमी पड़ जाती हैं।
कई महत्वाकांक्षी घोषणाएं नौकरशाही और प्रक्रियागत बाधाओं में उलझ जाती हैं। यही वजह है कि इन फैसलों की सफलता उनकी घोषणा में नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन में छिपी है।
•
निष्कर्ष: क्या यह नए भारत का खाका है?
केंद्रीय मंत्रिमंडल के हालिया फैसले केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं हैं। ये उस भारत की कहानी कहते हैं जो अपने किसान को असुरक्षित नहीं छोड़ना चाहता, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए दुनिया पर निर्भर नहीं रहना चाहता और जो अपने युवाओं को केवल दर्शक नहीं बल्कि विजेता बनते देखना चाहता है।
•
पीएम-किसान किसानों को भरोसा देता है।
•
समुद्र मंथन ऊर्जा सुरक्षा की उम्मीद जगाता है।
•
सूर्य सरोवर हरित भविष्य का रास्ता दिखाता है।
•
और खेलो इंडिया नए भारत के सपनों को पंख देता है।
अब देश की नजर इन घोषणाओं पर नहीं, बल्कि उनके परिणामों पर होगी। क्योंकि इतिहास योजनाओं से नहीं, उनके असर से लिखा जाता है। यदि ये चारों पहलें अपने लक्ष्य तक पहुंचीं, तो आने वाले वर्षों में इन्हें केवल सरकारी फैसले नहीं, बल्कि भारत के विकास की नई आधारशिला के रूप में याद किया जाएगा।
Disclaimer:
Tags:
0 comments. Be the first to comment.
सम्बंधित खबरें
#
बरोरा में दिनदहाड़े फायरिंग, बाल-बाल बचा युवक, पुलिस जांच में जुटी
#
नाली बंद होने से सड़क पर भरा पानी, करनडीह के लोगों ने उठाई आवाज
#
मुंगेर व्यवहार न्यायालय में लगी आग, पहली मंजिल पर मची अफरा-तफरी
#
JPSC-JSSC पेपर लीक के खिलाफ भाजपा ने निकला मशाल मार्च, सरकार पर साधा निशाना
#
चिरकुंडा से 111 कांवरियों का जत्था सुल्तानगंज रवाना, 'बोल बम' के जयकारों से गूंजा माहौल
ट्रेंडिंग न्यूज़
#
झारखंड में शुरू हुई नई T20 लीग, कोयलांचल सुपर किंग्स पर रहेंगी सभी की नजरें
#
ICU में भर्ती हुईं विधायक पूर्णिमा साहू, समर्थकों में बढ़ी चिंता; डॉक्टरों ने दी राहत की खबर
#
जमशेदपुर में शुरू हुई विशेषज्ञ कैंसर ओपीडी सेवा, अब शहर में ही मिलेगा अनुभवी डॉक्टरों का परामर्श
#
निरसा में सियासी शक्ति प्रदर्शन का महासंग्राम कल ,सांसद ढुलू महतो और विधायक अरूप चटर्जी आमने-सामने, जिला प्रशासन अलर्ट...
#
मारवाड़ी महिला समिति के आनंद मेले पर उठे सवाल, सेवा या सिर्फ कारोबार?